प्रसंगवश : सफेद झूठ में सफेद क्या है ?

-सुभाष श्रीवास्तव


रायपुर (News27)05.03.2024 ।  रंगो का त्यौहार होली ज्यादा दिन नहीं बचे हैं। ऐसे में प्रसंगवश रंगों की बात ही कर लेते हैं। रंग तो सभी अच्छे होते हैं, ये अलग बात है कि हर किसी की च्वाईस में एक खास तरह का रंग होता है, जो उसे सबसे ज्यादा अच्छा लगता है, परन्तु एक खास रंग ऐसा भी है जो लगभग सबको पसंद है। जैसे कि काला रंग बहुत लोग का पसंदीदा रंग हो सकता है पर हर कोई पसंद करता हो ऐसा बिल्कुल नहीं है, जबकि सफेद रंग नापसंद करने वालों के भी फेवरेट रंग हो सकते हैं। कहने का मतलब सफेद रंग को काले रंग के बजाय अधिक लोग पसंद करते हैं यह बात सच है, तब फिर झूठ क्या है ? मैं कहना ये चाहता हूं कि सफेद झूठ में आखिर ये सफेद क्या है ? जाहिर है सफेद रंग, रंगों की जमात का एक रंग ही है, पर झूठ में सफेदी कहां से आ गई, कहने का मतलब झूठ सफेद कैसे हो गया, इसका यह मतलब भी हो सकते हैं कि सच के भी कोई रंग है ?

पश्चिम के देशों में बोलचाल की भाशा में प्रयुक्त होने वाले झूठ में दरअसल सफेद झूठ को इंग्लिश में व्हाईट-लाई कहां जाता है, जिसका अर्थ एक ऐसा व्हाईट-लाई यानी सफेद झूठ, जिससे किसी का हानि ना हो, किसी के मनोबल को बढ़ाने या मन रखने के लिए बोला गया व्हाईट-लाई यानि सफदे झूठ। जैसे- कोई किसी चीज में बेहतर प्रदर्शन ना कर पाये फिर भी उसका मनोबल बढ़ाने के लिए हम कह देते हैं- षानदार, बहुत अच्छा प्रदर्शन। इससे उसका हौंसला बढ़ जाता है और मनोबल नहीं टूटता, जबकि हिन्दी के सफेद झूठ में सफेद प्रतीकात्मक रूप से असंभवगत झूठ है। जो हो ही नहीं सकता ऐसा झूठ, जैसे- मैंने सूरज को हथेली पर ले लिया, यह हो ही नहीं सकता यह तो सफेद झूठ है। एक अन्य उदाहरण में एक सीधा-साधा व्यक्ति जो ना तो चोर है और ना ही चोरी कर सकता है फिर भी उसे फंसाने के लिए चोर ठहरा दिया गया है, यह है सफेद झूठ। जिससे सामने वाले की निष्चित ही हानि हो और ऐसा झूठ जिसका कोई लाॅजिक ही ना हो, यानी सब लोग जानते हैं जिस पर चोरी का इल्जाम लगा है, वह व्यक्ति चोर हो ही नहीं सकता परन्तु उसे साजिषन चोर साबित कर उसे जबरन फंसा दिया गया हो, तो ऐसे झूठ को ही सफेद झूठ की संज्ञा दी गई है। सफेद रंग एक ऐसा रंग है जिस पर कोई भी रंग चढ़ जाता है, जैसे किसी भी नए वस्तु को पहले सफेद रंग से रंगा जाता है फिर उस पर मनचाहा रंग चढ़ाया जाता है। वैसे ही सफेद रंग एक ऐसा रंग है, जिसके उपर कोई रंग चढ़ जाये तो आदतन झूठ बोलने वालों के मनगढ़ंत झूठ में सच का झूठा परत लगाने बोला गया झूठ ही सफेद झूठ के रूप् में प्रचलित हो गया और यही सफेद झूठ की सफेदी का रहस्य भी है।


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