शहीद बख्तर साय व मुंडन सिंह ने अंग्रेजों को किया युद्ध में परास्त ,आज के दिन दोनों को हुई फांसी की सजा

रौतिया समाज ने शहीद दिवस  पर बख्तर साय व मुंडन सिंह की शहादत  को किया याद

शहीद बख्तर साय, मुंडन सिंह निडर  होकर अंग्रेजों  से लड़े 

जशपुर नगर। जिला मुख्यालय के शहीद बख्तर साय, मुंडन सिंह रौतिया भवन बिजली टोली में गुरुवार को रौतिया समाज ने शहीद दिवस मनाया। इस कार्यक्रम में  प्रदेश अध्यक्ष ओमप्रकाश साय , प्रदेश कोषाध्यक्ष विद्याचरण सिंह, प्रदेश संगठन महामंत्री विजयबिहारी सिंह, जशपुर मंडल से मण्डल कार्यकारी अध्यक्ष बलराम राम, मण्डल सचिव अमित कुमार सिंह, मंडल कोषाध्यक्ष सूरज सिंह, अजय सिंह, शिवनाथ राम , बालकृष्ण सिंह विश्वनाथ सिंह,नंदकिशोर बैगा,रामकृष्ण , शुतुल राम,रवि राम, विजय सिंह समेत समाज के अन्य लोग शामिल हुए । उन्होंने वीर शहीदों को पुष्प  अर्पित कर श्रद्धांजली देकर नमन किया।   इस अवसर पर रौतिया समाज ने शहीद  बख्तर साय, मुंडन सिंह की   शहादत  को  याद करते हुए उनके योगदान को याद किया। ओमप्रकाश साय ने बताया  शहीद बख्तर  साय नवागढ़ पतराटोली बांसदेव कोना और  मुंडन सिंह पनारी जिला गुमला (झारखण्ड) के जमींदार थे। वे रिश्ते में आजा नाती थे। दोनों में देश प्रेम, समाज प्रेम की भावना कूट -कूट कर भरी थीं। 

  अंग्रेजी सैनिकों को मार-काट कर किया धरासाई 

इतिहास के अनुसार  1812 ई में देश पर  अंग्रेजों का  हुकूमत चलता था। उनके खौफ से भारत देश भयभीत था। देश अंग्रेजों की गुलामी में थे। उसी दौरान अंग्रेजो ने वीर शहीद बख्तर साय नवागढ़ बासदेवकोना के पास कर वसूली के लिए अपना सैनिक भेजा।  उस समय कर वसूल का विरोध कर वीरों ने अंग्रेजों का   सिर धड़ से काट कर अलग कर दिया और उन्हें यह कहला भेजा कि हम भारत देश के वासी है तुम्हे कर नहीं देंगे ।  शहीद बख्तर साय व मुंडन सिंह  से  अंग्रेज हुकूमत  थर्रा गई और भय से काँप उठे और उसके दमन के लिए अंग्रेज कैप्टन डोनल ने सैनिक लेकर  बांसदेवकोना पहुंचे । शहीद बख्तर साय ने भी पहाड में अपना मोर्चा सम्भाला। उनके पास 500 सैनिक  तथा अंग्रेजों के पास 5000 सैनिक थे । उन्होनें सभी सैनिकों को मार-काट कर धरासाई कर दिया। पूरा पहाड़ रक्त रजीत हो गया। लड़ाई ऐसा था, कि बख्तर साय को पकड़ने के लिए  सैनिक पहाड़ में चढ़ते थे तो ऊपर से बड़े-बड़े पत्थर लुढ़काते और वहीं खून की नदी बह गई। आज भी उस जगह को रका तालाब के नाम से पुकारते हैं। 

अंग्रेजों की चाल में फसें शुरवीर

अंग्रेज हुकूमत उनकी वीरता से तिलमिलाई और हजारों सैनिक बुलाया । पूरा पहाड़ बदूंकों की गोली से गरजने लगा लेकिन अंग्रेजों ने दोनों का  कुछ नही बिगड़ सके। वीर बख्तर साय को अंग्रेजो के सैनिकों से घिरा सुनकर वीर मुंडन सिंह पनारी से उनके सहयोग के लिए बांसदेवकोना पहुंचे । दोनो वीरों  ने अंग्रेज सेना को तबाह कर दिया।अंग्रेजों ने अपने को असफल देख एक कूटनीति चाल चली  जहां का वें पानी पीते थे पानी की धारा में ऊपर की तरफ से गाय को मारकर पानी में फेंक दिए और पानी को अशुद्ध कर दिया। जिससे बांसदेवकोना के पहाड़ से दोनो वीर जुरतेला के पास डुगूल पहाड़ आ गये। कहते हैं राजा के सहयोग से उन दोनों वीरों को धोखा देकर अंग्रेजो से पकड़वाया गया और उहें कैद करके हजारीबाग होते हुए कलकत्ता के जेल में पहुँचाये और 04अप्रैल 1812 ई. को दोनो वीर को कलकत्ता के विक्टोरिया मेमोरियल हाल में फांसी की सजा दी गई।

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