पड़ोसी के वीडियो ने खोली बर्बरता की परत
PETA इंडिया की शिकायत पर खमरडीह थाने में मामला दर्ज
रायपुर। किसी भी शहर की पहचान उसकी इमारतों या विकास कार्यों से नहीं, बल्कि उसके सबसे असहाय जीवों के प्रति उसके व्यवहार से होती है। राजधानी रायपुर में दो पालतू कुत्तों के साथ कथित मारपीट और एक को उबलते पानी से झुलसाने की घटना ने संवेदनशील नागरिकों को झकझोर दिया है।
घटना का खुलासा तब हुआ जब एक चिंतित पड़ोसी ने कथित मारपीट का वीडियो साझा किया। फुटेज में दिखाई दे रहे दृश्य अत्यंत विचलित करने वाले बताए जा रहे हैं। स्थानीय स्वयंसेवकों वंचना लाबन, दीपेश मौर्य और उर्जा शृंगारपुरे ने मौके पर पहुंचकर कुत्तों की हालत देखी और गंभीर चिंता व्यक्त की। आरोप है कि एक कुत्ते को उबलते पानी से झुलसाया गया, जबकि दोनों के साथ बेरहमी से मारपीट की गई।
मामले की जानकारी मिलते ही People for the Ethical Treatment of Animals (PETA इंडिया) ने डीसीपी नॉर्थ, एसीपी तथा खमरडीह थाना पुलिस से संपर्क कर तत्काल कार्रवाई की मांग की। स्वयंसेवकों के सहयोग से भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 325 के तहत प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराई गई। यह धारा किसी भी पशु को अपंग करने या मारने को संज्ञेय अपराध मानती है, जिसके लिए पाँच वर्ष तक का कारावास, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है।
पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। PETA इंडिया ने खमरडीह थाना से पीड़ित कुत्तों को सुरक्षित जब्ती में लेकर समुचित चिकित्सकीय उपचार उपलब्ध कराने का अनुरोध किया है, ताकि आगे किसी संभावित क्षति से बचाया जा सके।
यह मामला केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना की परीक्षा भी है। पालतू पशु संपत्ति नहीं, बल्कि संवेदनशील जीव होते हैं। वे अपना दर्द शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकते, पर उनकी कराह मौन नहीं होती। पशु-क्रूरता के मामलों को विशेषज्ञ सामाजिक हिंसा के व्यापक पैटर्न से भी जोड़कर देखते हैं।
यह भी स्पष्ट है कि किसी भी व्यक्ति को दोषी ठहराना न्यायालय का विषय है और जांच अपने निष्कर्ष तक पहुंचेगी। किंतु नागरिक समाज की जिम्मेदारी उससे पहले शुरू होती है—जब वह अन्याय देखता है और चुप रहने के बजाय आवाज उठाता है।
रायपुर की यह घटना एक चेतावनी है कि संवेदनहीनता सामान्य न बन जाए। कानून की धाराएं आवश्यक हैं, पर सभ्यता का आधार दया है।
फिलहाल जांच जारी है। अब निगाहें इस पर हैं कि न्यायिक और प्रशासनिक प्रक्रिया कितनी तत्परता से आगे बढ़ती है। उससे भी बड़ा प्रश्न समाज के सामने है—क्या हम उन आंखों की दहशत को महसूस करेंगे, जो बोल नहीं सकतीं, या इसे भी एक और खबर मानकर आगे बढ़ जाएंगे?

