स्वतंत्रता संग्राम के अग्रदूत पंडित नारायणराव मेघावाले

धमतरी। देश की आज़ादी का इतिहास केवल दिल्ली, बंबई या कोलकाता तक सीमित नहीं रहा — इसकी गूंज छोटे-छोटे कस्बों और गाँवों तक फैली थी। छत्तीसगढ़ का धमतरी जिला भी उन्हीं गौरवशाली स्थलों में से एक है, जिसने देश के स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी भूमिका निभाई।

जब देशभर में महात्मा गांधी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आंदोलन और नमक सत्याग्रह की लहर उठी, तब धमतरी के वीर सपूत श्रद्धेय पंडित नारायणराव मेघावाले ने भी अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध बिगुल बजाया। गांधीजी के आदर्शों से प्रेरित होकर उन्होंने धमतरी में नमक कानून तोड़कर यह संदेश दिया कि स्वतंत्रता केवल बड़े शहरों की लड़ाई नहीं, बल्कि देश के हर नागरिक की आत्मा की पुकार है।

कंडेल नहर सत्याग्रह

सन 1920 के दशक में जब ब्रिटिश हुकूमत ने किसानों पर नहर कर (टैक्स) थोप दिया, तब कंडेल गांव के किसानों ने इसका विरोध किया। इस आंदोलन के केंद्र में थे पंडित नारायणराव मेघावाले। उन्होंने किसानों को संगठित किया, शांति और अहिंसा के मार्ग पर चलकर ब्रिटिश शासन को चुनौती दी।
यह वही ऐतिहासिक आंदोलन था, जिसने महात्मा गांधी को भी छत्तीसगढ़ आने के लिए प्रेरित किया। गांधीजी ने कंडेल नहर सत्याग्रह को भारत के जनआंदोलन का प्रतीक बताया और कहा “छत्तीसगढ़ की धरती ने आज स्वतंत्रता का नया अध्याय लिखा है।”

धमतरी की मिट्टी में बसी आज़ादी की खुशबू

पंडित नारायणराव मेघावाले का योगदान केवल आंदोलनों तक सीमित नहीं था। उन्होंने जनजागरण, शिक्षा और स्वदेशी के प्रचार में भी अग्रणी भूमिका निभाई। उनका संकल्प था —जब तक भारत की आखिरी आत्मा भी गुलामी में है, तब तक स्वतंत्रता अधूरी है।”आज भी जब हम स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस मनाते हैं, तो धमतरी की माटी उन दिनों की गवाही देती है, जब यहां के सपूतों ने अंग्रेजी हुकूमत की जंजीरों को तोड़ने का साहस दिखाया था।पंडित नारायणराव मेघावाले का जीवन छत्तीसगढ़ के लिए गर्व और प्रेरणा का स्रोत है। उनके आदर्शों से प्रेरित होकर नई पीढ़ी को यह समझना चाहिए कि देशप्रेम केवल एक भावना नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी है — जिसे हर पीढ़ी को निभाना होता है।

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