बिगलू प्रसाद गुप्ता कि मूर्तिकारी के आगे पस्त हुए कलकत्ता के मूर्तिकार

पांचवी फेल बिगलू प्रसाद गुप्ता ने मूर्तिकारी से लाखों का दिल जीता

मूर्तिकार बिगलू मिट्टी से आकर्षक तरह – तरह की मूर्ति को जीवित रूप दे रहें

जशपुर नगर. एक दौर में पांचवी पास ने बड़ी नौकरियां की तो पांचवी फेल भी कम नही थे. ऐसे लोग आज भी मौजूद है. आज हम आपको मूर्तिकार बिगलू प्रसाद गुप्ता के बारे में बताने जा रहें है बिजली टोली निवासी बिगलू प्रसाद गुप्ता पांचवी में तीन बार फेल हुए . इस वजह से उनको घर में माता पिता से फटकार सुनना पड़ता था. तरह -तरह की बातें सुनकर उनका दिमाक पक गया . अंततः उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ दी. आगे भविष्य अंधर में था वहीं समय भी निकलता जा रहा था. . ऐसे हालात और मुश्किलों के बीच कुछ कर गुजरने का रास्ता ढूंढ़ रहें थे. किस्मत ने दरवाजे बंद किए लेकिन अगला रास्ते खोल दिए .ऐसा बिगलु प्रसाद गुप्ता के साथ हुआ. 1962 में जब भारत चीन कि लड़ाई हुई थीं उस दौरान कलकत्ता से जशपुर नगर में मूर्तिकार आएं थे. जो बाजार डांढ में मूर्तियां बना रहें थे जिसे देखकर बिगलू प्रसाद गुप्ता मन्त्रमुग्ध हो गए. उनकी कारीगरी देख उन्होंने मूर्तिकार बनने कि ठान लिया.वो काम के लिए मूर्तिकारों के पास गए वहां उनको नही रखा गया l उल्टा उन्हें डांट के भगा दिए. जिससे वह मायूसी हो गए .फिर क्या था ज़ब मूर्ति कार मूर्ति बनाते तब बिगलु उसे छिप कर देखते और घर में जाकर मूर्तियां बनाने का अभ्यास करते थे. मूर्तिकारी के गुर सीखने के बाद बिगलु प्रसाद ने 1965 में अपनी खुद की मूर्तिकारी शुरू की. उनकी हुनर के आगे कलकत्ता मूर्तिकार पस्त हो गए. आखिरकार उन्हें बंगाल भगाना पड़ा. बिगलु ने अपनी बेहतरीन मूर्तिकारी से लाखों का दिल जीता है.वह जशपुर जिले के पहले लौते मुतिकार है जिन्होंने प्रदेश में मूर्तिकारी से अपनी पहचान बनाई है.

पहली कमाई का ख़रीदा रिक्सा

संघर्ष करने वाले को उनकी मेहनत के दिन और पहली कमाई हमेशा याद रहते है. उनके संघर्ष के दौरान विजय, अजय, भाई रामअवतार, रामदेव गुप्ता, समेत परिवार का भरपुर साथ एवं सहयोग रहा है.
बिगलु प्रसाद गुप्ता बताते है 1962 में उन्होंने कुछ पैसे जमा कर पेंट, ब्रश ख़रीदा और मूर्तिकारी शुरू की. पहली मूर्ति की दूकान बाजार डांढ़ में लगाईं. उस समय मूर्ति खरीददारों की भीड़ लग गई. जिसकी क़ीमत 5 रु.थीं.
एक समय में बिगलु मूर्ति निर्माण के लिए लावा नदी की मिट्टी भार में ढोकर लाया थे. मिट्टी ढोकर लाते उनकी हाथों में छाला पड़ जाता था. मूर्तिकार ने अपनी जरूरतों को देखते हुए पहली कमाई का रिक्सा ख़रीदा था जिसे वह आज भी बहुत हिफाजत के साथ रखे हुए है. जिसमें आज भी वह मिट्टी ढोकर लाते हैं. बिगलु बताते है कि वह 74 की उम्र में लाखों मूर्तियां अब तक बना चुके है. उम्र के इस बढ़ते पड़ाव में वह निरंतर मूर्तियां बना रहें है. इस बार गणेश उत्सव व विश्वकर्मा पुजा के लिए लक्ष्मी गुड्डी मंदिर के निकट सैकड़ो मूर्तियां बनाई है, जो दिखने में बेहद आकर्षक लग रही है.

मेहनत ने रास्ते खोले

बिगलु ने बताया कि मेहनत करने वालों के रास्ते कभी बंद नही होते . मुझे भी अवसर मिला पर कई जगह नाकाम रहा लेकिन मेहनत ने रास्ते खोले.मूर्तिकारी में मैंने पैसे के साथ नाम कमाया.मैं ज़ब पांचवी फेल हुआ तब मुझे ऐसा लगा कि किस्मत ने मेरी तकदीर बंद कर दी. लेकिन जो हुआ अच्छे के लिए हुआ. मैं पढ़ाई में अच्छा था नही था इसलिए मैंने मूर्तिकारी का रास्ता चुना.

महाराष्ट्रन स्टाइल में मूर्तियां

अजय गुप्ता ने बताया कि हर बार मूर्ति निर्माण में बदलाव किया जाता हैं.इस वर्ष महाराष्ट्र के तर्ज में लम्बी सुढ और मोटे पेट वाले गणेश बनाई गई हैं. जिसे काफी पसंद किया जा रहा हैं. पिछले बार कि तुलना में इस बार मूर्तियों कि कीमत बढ़ी हैं लेकिन पुराने रेट पर मूर्तियां बेचीं जा रहीं हैं.

लावा नदी कि मिट्टी से निर्मित हो रहीं मूर्तियां

बिगलु बताते है मूर्तिनिर्माण के लिए लावा नदी कि मिट्टी का उपयोग किया जाता है. यहां कि मिट्टी चिकनी और अच्छी होती है . मूर्ति निर्माण कि जगह को गोबर से लिप कर शुद्ध किया जाता है, इसके बाद ही मूर्ति निर्माण का कार्य प्रारम्भ किया जाता है.

छत्तीसगढ़ समेत अन्य राज्यों में मूर्तियों कि मांग

बिगलु प्रसाद गुप्ता कि मूर्तिकारी को प्रदेश समेत अन्य राज्यों में सरहा गया है. उनके द्वारा बनाई मूर्तियों कि मांग झारखंड, बंगाल, उड़ीसा,व छत्तीसगढ़ में हो रहीं हैं.

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