वरिष्ठ पत्रकार अजयभान सिंह का राजनीतिक व्यंग्य “अथ कोसल देश मीडिया आख्यानम”

छत्तीसगढ़ में राजनीति और मीडिया का नया अध्याय

छत्तीसगढ़ की राजनीति में सत्ता परिवर्तन के साथ-साथ मीडिया के सुर बदलने की परंपरा एक बार फिर देखने को मिली है। 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की भूपेश बघेल सरकार सत्ता से बाहर हुई और भाजपा ने विष्णु देव साय के नेतृत्व में वापसी की। लेकिन असली दिलचस्पी इस सत्ता परिवर्तन की नहीं, बल्कि उन चेहरों की रही जिन्होंने सत्ता के साथ अपना रुख और रंग दोनों बदल लिए।

भूपेश सरकार के दौरान दरबारी पत्रकारिता का दौर चरम पर था — सरकारी विज्ञापन, सम्मान और नज़दीकी संवाद के सहारे पत्रकारों का एक तबका सत्ता का प्रवक्ता बन चुका था। जैसे ही सरकार बदली, वही चेहरा अब भाजपा की “नई शुरुआत” और “शालीन नेतृत्व” की कहानियाँ लिखने लगा। दरबार वही रहा, बस राजा बदल गया।

राजधानी रायपुर में मीडिया जगत में सत्ता परिवर्तन के बाद हलचल दिखी। जो पत्रकार पहले कांग्रेस की नीतियों की तारीफ़ करते थे, वे अब मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के भाषणों में “विकास और संस्कृति” की बातें खोजने लगे। कुछ ने खुद को “पिछली सरकार में पीड़ित पत्रकार” बताकर नए सत्ताधारियों के करीब पहुँचने का रास्ता बना लिया।

डॉ. रमन सिंह के शासनकाल में सक्रिय रहे पुराने चेहरे भी फिर लौट आए। उनकी भाषा में “संघ की संस्कृति” और “विकास का विश्वास” जैसे शब्द लौटे और प्रचार विभाग में उनके पुराने प्रशंसक सक्रिय हो गए। वहीं, कुछ ऐसे पत्रकार जो चुनाव में भाजपा को “भीतर से मदद” देने का दावा करते थे, उन्हें दरकिनार कर दिया गया। अब वे सोशल मीडिया पर अपनी नाराज़गी जाहिर कर रहे हैं।

राज्य के वरिष्ठ विश्लेषकों का कहना है कि “छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता अब विचारधारा नहीं, सत्ता के समीकरणों से संचालित होती है। सत्ता जिसके पास होती है, सत्य उसी का हो जाता है।”

अजयभान सिंह की यह कथा एक गहरे व्यंग्य के साथ समाप्त होती है – जहाँ स्वामी अड़बड़ानंद मौन हो जाते हैं। वह मौन उस असहज सच्चाई का प्रतीक है कि अब पत्रकारिता जनता की नहीं, सत्ता की आवाज़ बन चुकी है।

रायपुर के एक वरिष्ठ संपादक की टिप्पणी में सार छिपा है


“छत्तीसगढ़ में सरकारें बदलती हैं,
पर दरबारी वही रहते हैं,
बस राजा और जय-जयकार के नारे बदलते हैं।”

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