दीपावली में गरीब का दर्द छलका एसईसीएल कुसमुण्डा गेट पर अनिश्चितकालीन धरना

भूमि के एवज में रोजगार की मांग को लेकर भूख हड़ताल पर बैठे संजय दुबे

कोरबा। जब पूरा देश दीपावली की रोशनी में नहा रहा था, उसी रात एसईसीएल कुसमुण्डा क्षेत्र के विस्थापित परिवार न्याय की उम्मीद में बैठे है। भूमि के एवज में रोजगार की मांग को लेकर 22 वर्षों से संघर्षरत प्रभावित व्यक्ति संजय दुबे (सिक्योरिटी) ने आखिरकार धैर्य की सीमा पार करते हुए 20 अक्टूबर 2025 से जीएम कार्यालय के सामने भूख हड़ताल और अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर दिया।

संजय दुबे ने बताया कि उनके परिवार की जमीन एसईसीएल कुसमुण्डा परियोजना में अधिग्रहित की गई थी। उस समय कंपनी ने प्रभावित परिवारों को रोजगार देने का आश्वासन दिया था, लेकिन दो दशक बीत जाने के बाद भी वादा पूरा नहीं हुआ। लगातार अधिकारियों के चक्कर लगाने और आवेदन देने के बावजूद सिर्फ आश्वासन ही मिले, समाधान नहीं।

जमीन छीन कर रोजगार नही दिया

उन्होंने कहा कि “हमारी जमीन छीन ली गई, बदले में रोजगार देने का वादा किया गया था। अब अधिकारी और ठेकेदार लाभ उठा रहे हैं, जबकि हम रोज़ी-रोटी के लिए संघर्ष कर रहे हैं।” संजय दुबे का कहना है कि प्रशासनिक उपेक्षा और एसईसीएल प्रबंधन की उदासीनता ने उन्हें भूख हड़ताल जैसे कदम उठाने को मजबूर किया है।

पत्र सौंपाकर दी चेतावनी

भूख हड़ताल के दौरान दुबे ने प्रशासन को एक पत्र सौंपा है जिसमें उन्होंने कहा है कि यदि आंदोलन के दौरान किसी प्रकार की अनहोनी होती है तो उसकी पूरी जिम्मेदारी एसईसीएल कुसमुण्डा क्षेत्र के महाप्रबंधक तानाजी पाटिल की होगी। उन्होंने सरकार और कोल इंडिया प्रबंधन से तत्काल रोजगार उपलब्ध कराने तथा विस्थापित परिवारों के लंबित प्रकरणों का निपटारा करने की मांग की है।

धरना स्थल पर स्थानीय ग्रामीण और अन्य प्रभावित परिवार लगातार पहुँचकर संजय दुबे का समर्थन कर रहे हैं। कई सामाजिक संगठनों और मजदूर प्रतिनिधियों ने भी इस आंदोलन को ‘विस्थापितों की आवाज़’ बताया है। लोगों का कहना है कि दीपावली के इस पावन पर्व पर जब हर घर में दीप जल रहे थे, तब संजय दुबे के घर अंधेरा था। उनके बच्चे अपने पिता के साथ धरना स्थल पर बैठे रहे — इस उम्मीद में कि शायद अब सरकार उनकी पीड़ा सुने।

रोजगार मिलने पर त्यौहार

संजय दुबे ने कहा कि “हमारा त्यौहार तब होगा जब हमें न्याय मिलेगा, जब हमारे घरों में रोजगार की लौ जलेगी।”
इस भावनात्मक अपील ने क्षेत्र में चर्चा पैदा कर दी है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि जल्द ही कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया तो आंदोलन और व्यापक रूप ले सकता है।

गौरतलब है कि कुसमुण्डा क्षेत्र में सैकड़ों परिवारों की भूमि अधिग्रहित की गई थी। कई मामलों में रोजगार और मुआवज़े के वादे अब तक अधूरे हैं। वर्षों से प्रभावित परिवार ज्ञापन, प्रदर्शन और धरना के माध्यम से अपनी मांगें रखते आ रहे हैं, लेकिन समाधान आज भी अधर में है।

दीपावली की रात संजय दुबे की यह भूख हड़ताल सिर्फ एक व्यक्ति का विरोध नहीं, बल्कि उन सैकड़ों विस्थापित परिवारों की वेदना बनकर सामने आई है, जो अपने हक और सम्मान के लिए अब भी संघर्ष कर रहे हैं।

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