रायगढ़ में प्रस्तावित पुरुंगा कोयला खदान से 2.25 मिलियन टन वार्षिक उत्पादन

पुरुंगा खदान से पर्यावरण और विकास के बीच मिलेगा संतुलन

रायगढ़/रायपुर ।भारत इस समय ऊर्जा आत्मनिर्भरता के महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहा है। वैश्विक स्तर पर संसाधन संकट और पर्यावरणीय चुनौतियों के बीच देश ने विकास और संरक्षण का संतुलित मॉडल अपनाया है। इसी दिशा में भूमिगत खनन तकनीक ऊर्जा क्षेत्र का भविष्य साबित हो रही है। रायगढ़ जिले में प्रस्तावित पुरुंगा भूमिगत कोयला खदान इसी परिवर्तन का एक अहम उदाहरण बनने जा रही है।

2.25 मिलियन टन वार्षिक उत्पादन क्षमता वाली यह परियोजना पूरी तरह आधुनिक और पर्यावरण-अनुकूल तकनीक पर आधारित है। कोयला मंत्रालय ने हालिया विज्ञप्ति में स्पष्ट किया है कि भूमिगत खनन सतह की हरियाली, वन संपदा और कृषि भूमि को बिना किसी नुकसान के संचालित किया जा सकता है।

ऊर्जा के साथ पर्यावरण का संरक्षण

इस परियोजना में खनन गतिविधि 500 से 2000 फीट की गहराई में होगी। सतह पर न तो खुदाई होगी और न ही विस्फोटक गतिविधि। इससे ऊपर की भूमि, खेत, पेड़, आवास और वनोपज पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। विशेषज्ञों के मुताबिक भूमिगत खनन से कृषि भूमि की उर्वरता पूरी तरह सुरक्षित रहती है और फसल उत्पादन में कोई गिरावट नहीं आती।

वन्यजीवों के लिए सुरक्षात्मक ढाल
सामान्य तौर पर खनन को वन्यजीवों के लिए खतरा माना जाता है, लेकिन इस तकनीक में सतह पर मशीनरी, ट्रक मूवमेंट या ब्लास्टिंग की जरूरत नहीं पड़ती। इससे हाथी, हिरण, लोमड़ी, पक्षियों सहित सभी वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास अप्रभावित रहते हैं।

धूल, शोर और प्रदूषण में भारी कमी
ओपन कास्ट माइनिंग की तुलना में भूमिगत खनन में धूल, शोर और कंपन लगभग शून्य रहते हैं। कोल डस्ट सतह पर नहीं पहुंचता और आसपास के गांवों की वायु गुणवत्ता सुरक्षित रहती है। खदान से निकलने वाले पानी को आधुनिक फिल्टरिंग सिस्टम से शुद्ध कर ग्रामीण क्षेत्रों के उपयोग के लिए उपलब्ध कराया जाएगा।

जलस्रोत और मिट्टी की गुणवत्ता सुरक्षित
ग्रामीण इलाकों में जलस्रोत आम तौर पर 40-50 फीट की गहराई तक ही होते हैं, जबकि खनन 500 फीट से अधिक गहराई में किया जाएगा। इससे भूजल स्तर और मिट्टी की गुणवत्ता पर कोई प्रतिकूल असर नहीं होगा। जल निकासी प्रणाली भी वैज्ञानिक मानकों के अनुरूप होगी।
स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार और विकास के अवसर
पुरुंगा परियोजना से स्थानीय युवाओं को रोजगार, प्रशिक्षण और कौशल विकास के अवसर मिलेंगे। साथ ही, परिवहन, मरम्मत, मशीनरी और सेवा क्षेत्र में सहायक रोजगार भी पैदा होंगे। ग्राम पंचायतों को CSR के माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल और सड़क विकास जैसी सुविधाएँ प्राप्त होंगी।

विराेध नहीं, संवाद की ज़रूरत
कुछ समूहों द्वारा भूमि अधिग्रहण और पर्यावरण संबंधी चिंताएँ जताई जा रही हैं। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि भूमिगत खनन सतही खनन की तुलना में कहीं अधिक सुरक्षित, पर्यावरण-अनुकूल और सामाजिक रूप से स्वीकार्य विकल्प है। ऐसे में निर्णय तथ्यों और दीर्घकालिक राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखते हुए ही लिए जाने चाहिए।

छत्तीसगढ़ की ऊर्जा भूमिका और भविष्य
छत्तीसगढ़ देश को कुल कोयला उत्पादन का लगभग 20 प्रतिशत देता है। पुरुंगा परियोजना राज्य के इस योगदान को और मजबूत करेगी और ऊर्जा आत्मनिर्भर भारत मिशन को गति देगी।

सतत विकास का भारतीय मॉडल
यह परियोजना साबित करती है कि विकास प्रकृति से संघर्ष नहीं बल्कि उसके साथ सामंजस्य में भी संभव है। कोयला मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के शब्दों में, “भूमिगत खनन भारत के ऊर्जा भविष्य का वह अध्याय है जिसमें विकास और पर्यावरण दोनों समान रूप से आगे बढ़ते हैं।”

पुरुंगा खदान देश को यह संदेश देती है कि धरती के भीतर छिपे संसाधनों का समझदारी से उपयोग हो तो सतह पर हरियाली, जीवन और उम्मीदें कायम रह सकती हैं। यही भारत का वास्तविक विकास मॉडल है: विकास भी, हरियाली भी

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