शहीद वीर नारायण सिंह की शहादत दिवस पर उनके शौर्य को किये याद

छत्तीसगढ़ के प्रथम क्रांतिकारी के जयघोष से गूंजा प्रदेश

BY। चैन सिंह गहने

शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय घुटकेल में श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित

धमतरी/ नगरी। छत्तीसगढ़ के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी शहीद वीर नारायण सिंह की शहादत दिवस पर गुरुवार 10 दिसंबर को पूरे प्रदेश में श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इसी कड़ी में शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय घुटकेल में श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किया गया, जहां विद्यार्थियों और शिक्षकों ने इस वीर सपूत के बलिदान को नमन किया। परिसर “अमर रहें शहीद वीर नारायण सिंह” के जयघोष से गूंज उठा।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि श्रीमती कुसुमलता समरथ और बीरेंद्र कुमार समरथ उपस्थित रहे। साथ ही विद्यालय के शिक्षक अश्वनी कुमार, उमेश कुमार, योगेश कुमार धुर्वे, राजेश देशलहरे, तोरण कुमार ध्रुव सहित अन्य स्टाफ मौजूद रहा।
मुख्य अतिथि कुसुमलता समरथ ने अपने उद्बोधन में कहा वीर नारायण सिंह का बलिदान केवल इतिहास नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के स्वाभिमान और पराक्रम की अमर कहानी है। कार्यक्रम को सफल बनाने में विद्यार्थियों उमेश्वर, रविंद्र कुमारी, अनामिका कुमारी, कांचन, संजय, अजय, निखिल, राहुल, अमन कुमार, यादिनी आदि ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस आयोजन का उद्देश्य विद्यार्थियों में देशभक्ति, वीरता और राष्ट्रप्रेम की भावना को जागृत करना रहा।विद्यालय प्रबंधन ने सभी अतिथियों, शिक्षकों और विद्यार्थियों के प्रति आभार व्यक्त किया।

रायपुर के जयस्तंभ चौक में वीर नारायण सिंह को दी गई फांसी

छत्तीसगढ़ के जननायक और सोनाखान के वीर सपूत वीर नारायण सिंह को आज उनकी शहादत दिवस पर पूरे प्रदेश में स्मरण किया गया।
इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि 1795 में जन्मे नारायण सिंह कम उम्र में ही अपने क्षेत्र के नेतृत्वकर्ता बन गए थे। अंग्रेजी शासन के विस्तार के साथ बढ़ी लगान नीति और कठोर प्रशासन ने आम लोगों का जीवन मुश्किल कर दिया। ऐसे समय में उन्होंने किसानों और गरीबों के हक में आवाज बुलंद की।

1856 के भीषण अकाल के दौरान उन्होंने खालसा गांव के एक व्यापारी के गोदाम में जमा अनाज को जरूरतमंदों में बाँटने का निर्णय लिया, ताकि गांव के लोग भुखमरी से बच सकें। इस कदम से ब्रिटिश अधिकारी उनसे बौखला उठे और उसी वर्ष अक्टूबर में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
हालाँकि सहयोगियों की मदद से वे कुछ समय के लिए जेल से निकलने में सफल रहे, लेकिन 3 दिसंबर 1857 को पुनः पकड़ लिए गए।

ब्रिटिश हुकूमत ने उनके संघर्ष और विद्रोह को दबाने के लिए 10 दिसंबर 1857 को रायपुर के जयस्तंभ चौक में सार्वजनिक रूप से फांसी देकर उन्हें शहीद कर दिया।
आज भी उनकी बहादुरी, जनसेवा और अन्याय के खिलाफ खड़े होने की भावना प्रदेशवासियों को प्रेरित करती है।


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